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पेल्हार पुलिस स्टेशन पर दोहरे रवैये का आरोप!

सरकारी महिला अधिकारी की शिकायत पर तुरंत केस, लेकिन गरीबों की फरियाद अनसुनी—निष्पक्ष कानून व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

सनसनी अबतक | विशेष प्रतिनिधि
वसई-विरार: मीरा-भाईंदर वसई-विरार पुलिस आयुक्तालय के अंतर्गत कानून व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि सरकारी महिला अधिकारी की शिकायत पर जहां तत्काल मामला दर्ज कर लिया गया, वहीं गरीब और वंचित परिवारों द्वारा लगाए गए मारपीट और अन्याय के आरोपों पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस कथित दोहरे रवैये ने प्रशासन और पुलिस की निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी है।

जाबरपाड़ा में कार्रवाई से मचा हड़कंप

सूत्रों के अनुसार, वसई-विरार शहर महानगर पालिका के प्रभाग समिति (एफ) कार्यक्षेत्र के जाबरपाड़ा इलाके में सोमवार (9 फरवरी 2026) उस समय तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई जब दोपहर में लगभग तीन बजे अतिरिक्त सहायक आयुक्त अश्विनी मोरे अपनी टीम के साथ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के लिए जेसीबी मशीन लेकर पहुंचीं। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि कार्रवाई के दौरान महानगर पालिका के कर्मचारी और महाराष्ट्र सुरक्षा बल के जवान कथित तौर पर घरों में घुस गए और तोड़फोड़ शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि इस दौरान महिलाओं और बच्चों को भी घरों से बाहर निकालने की कोशिश की गई, जिससे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

आशियाना बचाने घर से बाहर निकली महिलाएं

अपने घरों को बचाने के लिए स्थानीय महिलाएं विरोध में आगे आईं और डट गईं। कुछ पुरुष भी उनके समर्थन में उतर आए। रहवासियों का कहना है कि वर्षों की मेहनत और लाखों रुपये की जमा पूंजी से बने उनके घरों को बिना पर्याप्त चेतावनी के तोड़ा जा रहा था, जिससे आक्रोश स्वाभाविक था। लोगों का यह भी कहना है कि वे किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार और आशियाने की सुरक्षा के लिए खड़े हुए थे।

“सरकारी अधिकारी होने का पूरा फायदा?”

सूत्र बताते हैं कि स्थिति बिगड़ने के बाद महिला अधिकारी ने नजदीकी पेल्हार पुलिस स्टेशन में कई नामजद और अज्ञात लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज करा दिया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी अधिकारी होने का महिला अधिकारी ने पूरा फायदा उठाया और “सरकारी काम में बाधा उत्पन्न करने” जैसे गंभीर प्रावधानों के तहत केस दर्ज करवा दिए, जबकि वहां मौजूद परिवार आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं बताए जा रहे कि वे सरकारी मशीनरी का सामना कर सकें। उनका कहना है कि वे सिर्फ अपने आशियाने को बचाने की कोशिश कर रहे थे, न कि किसी सरकारी कार्य को बाधित करने की।

पहला दिन और सख्त कार्रवाई, नामजद पर भी सवाल

हैरानी की बात यह भी बताई जा रही है कि यह अधिकारी का प्रभाग समिति (एफ) कार्यालय में पहला ही दिन था, फिर भी शिकायत में उन लोगों के नाम शामिल किए गए जिन्हें अधिकारी कथित तौर पर जानती तक नहीं थीं। इतना ही नहीं, रास्ते में खड़े वाहनों को भी मामले में शामिल किया गया। इस घटनाक्रम ने कार्रवाई की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

घायलों की नहीं सुनी गई शिकायत?

दूसरी ओर, स्थानीय महिलाओं का आरोप है कि कार्रवाई के दौरान उन्हें भी चोटें आईं। एक व्यक्ति के सिर पर गंभीर चोट लगने की बात सामने आई है, जो कुछ समय तक मौके पर बेहोश पड़ा रहा। इसके बावजूद जब पीड़ित पक्ष पुलिस स्टेशन शिकायत दर्ज कराने पहुंचा, तो उन्हें कथित तौर पर खाली हाथ लौटना पड़ा। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

गरीबों पर ही क्यों सख्ती?

सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि अतिरिक्त सहायक आयुक्त के कार्यभार संभालने के पहले ही दिन गरीबों की झोपड़ियों पर कार्रवाई क्यों की गई? स्थानीय लोगों का आरोप है कि इलाके में हजारों स्क्वायर फीट में फैले बड़े-बड़े अवैध इंडस्ट्रियल गाले और कुछ निजी स्कूल भी मौजूद हैं, लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं की गई। क्या प्रशासन की सख्ती सिर्फ कमजोर तबके के लिए ही है?

नोटिस और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल

एक और गंभीर सवाल यह है कि क्या इन झोपड़ियों को तोड़ने से पहले विधिवत नोटिस दिया गया था? यदि नहीं, तो यह कार्रवाई किस आधार पर की गई?

साथ ही, इतनी संवेदनशील और विवादित जगह पर बिना पर्याप्त पुलिस सुरक्षा के टीम को महानगर पालिका कर्मियों की टीम लेकर जाना भी कई शंकाओं को जन्म देता है। क्या यह पूरी कार्रवाई पहले से तय थी?

किसके इशारे पर हुई कार्रवाई?

चर्चा इस बात की भी है कि आखिर किस बड़े नेता या वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर सबसे पहले गरीबों के घरों को निशाना बनाया गया? क्या नए पदभार ग्रहण करने का दिन इस कार्रवाई के लिए जानबूझकर चुना गया था? ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न अब प्रशासन के सामने खड़े हैं।

निष्पक्ष जांच की मांग तेज

कानून के जानकारों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों से मारपीट या चोट लगने के आरोप सामने आए हैं, तो निष्पक्ष जांच के तहत दोनों की शिकायत दर्ज होना आवश्यक है। अन्यथा यह न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत और समानता के विपरीत माना जाएगा।

फिलहाल, पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और पुलिस की निष्पक्षता पर गहरी छाया डाल दी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि गरीबों के साथ हुए कथित अत्याचार और अन्याय को लेकर उन्हें न्याय मिलता है या नहीं। आने वाला समय ही तय करेगा कि कानून का तराजू सभी के लिए बराबर है या नहीं।