सनसनी अबतक | मनोज तिवारी
मुंगरा बादशाहपुर (जौनपुर)। ग्राम पंचायत बखोपुर में पेयजल संकट को लेकर शुरू हुआ एक सामाजिक प्रयास अब राजनीतिक खींचतान का रूप लेता दिख रहा है। मामला हरी नारायण पाण्डेय के परिवार से जुड़ा है, जो पिछले करीब दस वर्षों से अपने घर पर एक अदद हैंडपंप के लिए तरस रहे हैं। मजबूरी ऐसी कि परिवार को लगभग 200 मीटर दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कई बार जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। गांव में यह चर्चा आम है कि बड़े-बड़े नेता भी इस छोटी मगर बुनियादी जरूरत को पूरा नहीं करवा पाए।
युवा नेता ने उठाई जिम्मेदारी
इसी बीच क्षेत्र के युवा नेता और समाजसेवी पंडित चंदन त्रिपाठी ने पहल करते हुए अपने स्तर से हैंडपंप लगवाने की जिम्मेदारी उठाई। ग्रामीणों का कहना है कि कार्य की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी। गड्ढा खोदने का काम आरंभ हुआ तो परिवार और आसपास के लोगों में राहत की उम्मीद जगी। लेकिन यह राहत ज्यादा देर टिक नहीं सकी।
बीच में अड़ंगा, काम ठप
ग्रामीण सूत्रों के मुताबिक, गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों को यह पहल रास नहीं आई। आरोप है कि उन्हीं की आपत्ति के बाद हैंडपंप का कार्य रुकवा दिया गया। अब निर्माण स्थल सूना पड़ा है और परिवार फिर से उसी पुरानी परेशानी में जीने को मजबूर है।
गांव में सवाल उठ रहा है कि जब काम जनहित का था, तो उसमें बाधा क्यों डाली गई? क्या सामाजिक कार्य भी अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ेंगे?
प्रशासन की भूमिका पर नजर
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक बाधा थी तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए था। लेकिन सीधे काम रुकवाना कई सवाल खड़े करता है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता है या नहीं।
पानी की समस्या बनी चुनौती
बखोपुर जैसे कई गांवों में पेयजल अब भी एक बड़ी समस्या है। सरकार की योजनाएं कागजों पर भले तेज रफ्तार से चल रही हों, लेकिन जमीनी स्तर पर कई परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हरी नारायण पाण्डेय का परिवार आज भी 200 मीटर दूर से पानी ढोने को विवश है। सवाल सिर्फ एक हैंडपंप का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो सामाजिक पहल को समर्थन देने के बजाय अवरोध खड़ा करती है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है—क्या बखोपुर में पानी की धारा बहेगी या सियासत का शोर ही गूंजता रहेगा?

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