हफ्ताखोरी के आरोप झेल चुके सागर इंगोले को मिली नई तैनाती, व्यवस्था पर उठे सवाल
सनसनी अबतक | विशेष प्रतिनिधि
वसई-विरार। मीरा-भाईंदर वसई-विरार (MBVV) पुलिस आयुक्तालय में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस कमिश्नर निकेत कौशिक की नियुक्ति के बाद जहां जनता को पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, वहीं अब उन्हीं पर पक्षपात और ढील बरतने के आरोप लगने लगे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, यातायात विभाग में तैनात रहे पुलिस निरीक्षक सागर इंगोले पर गंभीर आरोप लगे थे। एक महिला पुलिसकर्मी ने आरोप लगाया था कि ‘लाइट ड्यूटी’ देने के बदले हर महीने 15 हजार रुपये की मांग की जाती थी। इस मामले में एक एएसआई की संलिप्तता भी सामने आई थी।
मामला इतना गंभीर था कि मुंबई एंटी करप्शन ब्यूरो ने कार्रवाई करते हुए दोनों के खिलाफ काशीमीरा पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि कुछ ही दिनों में जांच प्रक्रिया ठंडी पड़ गई और आरोपी अधिकारी को न सिर्फ राहत मिली, बल्कि उन्हें नई जिम्मेदारी देते हुए पेल्हार पुलिस स्टेशन में तैनात कर दिया गया।
जनता के बीच उठ रहे बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—अगर आरोप बेबुनियाद थे, तो मामला दर्ज कैसे हुआ? और यदि आरोप सही थे, तो इतनी जल्दी जांच खत्म कर क्लीन चिट कैसे मिल गई? आम नागरिकों की शिकायतों पर कार्रवाई में देरी क्यों होती है, जबकि पुलिसकर्मियों के मामलों में तेजी क्यों? एक महिला पुलिसकर्मी पर लगे समान आरोप में निलंबन की कार्रवाई हुई, लेकिन अधिकारी को नई पोस्टिंग क्यों? ऐसे तमाम सवालों के जवाबों का इंतजार में जनता है।
दोहरा मापदंड या प्रशासनिक मजबूरी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस आयुक्तालय में ‘दोहरा कानून’ लागू होता दिख रहा है—जहां छोटे कर्मचारियों पर सख्ती और अधिकारियों को राहत मिलती है। इससे न केवल पुलिस की छवि प्रभावित हो रही है, बल्कि जनता का भरोसा भी डगमगा रहा है।
विश्वसनीयता पर संकट
MBVV पुलिस, जो कानून-व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, अब खुद ही सवालों के घेरे में है। पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग तेज होती जा रही है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि पुलिस कमिश्नर निकेत कौशिक इन आरोपों पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या कोई निष्पक्ष जांच सामने आती है या नहीं।

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